दूरियां तेरे-मेरे दरम्याँ की - 2

मंजिल के सफर में,
कोई साथ मिला,
एक कारवां सा बना था    I
नई उम्मीदों के सहर में,
कुछ दूर तल्क,
वो भी साथ चला था          II


उस मोड़ से गुजरी थी जिंदगी,
बहुत देर तल्क थमकर रह गयी       I
अपनों के भीड़ में बेगाना बनकर,
खुद के दरम्याँ में सिमट कर रह गयी   II


कभी मुलाकात, तो कभी हालात बिगड़े,
सवंरते रिश्तों के सौगात बिगड़े                   I
जो बिछड़ा, कभी बहुत करीब था अपना
कुछ कसूर , तो कुछ नसीब था अपना          II


राह-ए-उल्फत का सिलसिला,
यूँ बनता गया , जाने क्या हुआ जो,
काफिले से दूर अकेला रह गया ;
ज्यों-ज्यों कारवां बढ़ता गया               I


जिस दिन रवानगी होगी 
हर जिंदगी तब बेगानी होगी             I
बेमानी रिश्तों को कफ्न करके ,
उन सारी यादों को दफ्न करके ,
बस ख़त्म तेरी-मेरी कहानी होगी         I
वक्त की फिजाओं में अब ,
हर वो चीज पुरानी होगी ,
जिस दिन रवानगी होगी.........

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