उफ़ ! ये कातिल, ये गेसुओं की लताएं !
स्वेत कपाल पे स्याम मोतियों सी घटायें ।
भौहं संग लिपटी, वृक्ष चंदन भुजंग चढ़ आये ।
नयनों के संग फिर ये गुपचुप साजिश कैसी,
की घोलती है फिज़ा में चाहत की एक गरल सी ।
इठलाती मसनद ए गुल वाली गालों की वादियों में
उतरती, फिर लहराती जब ग्रीवा की घाटियों में ।
कमबख्त दिल ए मुंतशिर, अरसे मियांद की
अब किस कोतवाली, कहीं फरियाद हो उनकी ।
मेरे दिल के आलिंदों को इस कदर फांस ली हैं,
जान लेने का ये कोई मुनासिब तरीका तो नहीं ।
उफ़ ! ये कातिल, ये गेसुओं की लतायें !
No comments:
Post a Comment