ज्योंही घटना घटित होती है,
प्रतिक्रिया त्वरित होती है ।
वो जमाना भी और था,
पत्र-पत्रिका, पुस्तक, अखबार
और सभाओं का दौर था ।
ऐसे मंचों से जब एक से बढ़कर एक
वक्तव्य निकल आया करते थे ।
समस्याएं ही नहीं, उसके
हल भी निकल आया करते थे ।
अब तो घटना-दुर्घटना ही मौन है,
मतलब के मुद्दे गौण हैं ।
बात-बेबात पर चिल्लाने वाले,
टीवी-अखबार, आंदोलन सर पर उठाने वाले ।
पैसा चाहिए, झूठ भी चल जाएगा
नीति-नैतिकता का अब वरण कौन करे ?
सच मरता है तो मरे, क्या मौन बदल पाएगा,
भीष्ण समर से भिड़ने का अब प्रण कौन करे ?
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