फिर एक मद्धम सरसराहट उस बासंती की
और मन बांवरा बन कोयल सा कूंक जाते हो
जुबां, आंखे, ये सांसे सब बंद होने को इस कदर
जाने कैसी बयार संग अपने लाते हो ।
मेरी कलम-मेरी नज्म में जज्बातों के,
जाने कौन सी जान फूंक जाते हो ।।
बस धुंधलेपन में एक हुस्न ए शय छोड़
किसके चाहत के आशियाने को महका जाते हो ।
सामने होकर भी यूँ हुनर ए बेपरवाह,
हर बार आँख मिचौनी इस अदा से खेल जाते हो ।
खामोश ए दिल के लम्हें, हर मंद स्पंदन पे
जाने कैसी राग छेड़, एक कसक छोड़ जाते हो ।।
No comments:
Post a Comment