गोपाल संग प्रीत

तप्त धरा देख बदरा तरसे
मूर्क्षित पर्ण-तरुवर पे प्राण छींटने
बिन सावन, बिन नक्षत्र बरस जानी ।

भँवर-पुष्प क्या कोई बैर पुरानी
कोमल अधरों का आलिंगन दे जिसे
डंकों से आहत वो मधु भरी रसधानी ।

क्षीर को भी अमृत बना दे,
हर बूंद उसकी तन मन शीतल करे
ऐसी वो शरद पूर्णिमा की / पूरण चाँदनी ।

है अथाह अविरल व्याप्त जग में
उसकी आश की बूंद-बूंद को न तरसे
ऐसी प्रीत की डोर गोपाल संग बाँधनी ।

No comments:

Post a Comment