क्या तुमने चींटी देखा है ?
पल में ओझल ,
सबमे उपेक्षित ,
क्या वह लघु कीट देखा है ? 
विधाता की वह पहचान ,
कोई कृति कातर ,
मांग रहा जीने का
अधिकार एक समान I
वह भी डरता है, जब
धरा में हो कम्पन I
बदहवाश हो जाता है, जब
जोर से चले पवन I
उर में दया-प्यार समभाव ,
व्यथा से रोता आकुल तन-मन
पद-मर्दित होता है जब ,
कौन सुनता उसका क्रंदन ?
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