भक्ति वंदना

संभवतः वर्ष 1998 से पहले की, स्कूल के दिनों में लिखी हुई कविता को, बरबस आज अपने ब्लॉग पर पोस्ट करने का अवसर प्राप्त हुआ है ।

                       भक्ति वंदना

तु पत्थर का बुत है,
ये सभी जानते हैं ।
फिर भी, तुझे सभी,
भगवान अपना मानते हैं ।।

अमुक है, शान्त है,
स्वरूप है अज्ञात शक्ति का ।
श्रद्धा, पूजा सहस्रों का,
व्याप्त है सभी के धड़कनो में,
अतएव हमारे पूज्य है ।।

तू माटी का इंसान नहीं,
नश्वर या बलहीन नहीं,
जीवंत स्वरूप शक्ति का,
श्रद्धा से ही मिल सके,
कुप्रवृत्ति के तू संग नहीं ।।

सृष्टि तेरी रचना,
फल-फूल तेरी कृति,
हवा, अग्नि, दास सभी
व्याप्त है जो जनजीवन में ।।

भक्ति से तू निकट सभी के,
करुणामय अमृत प्राप्त हो,
सुख-वैभव की बरसात हो,
हरि नाम दो अक्षर,
आनंद की खुली मार्ग हो ।।

राम, कृष्ण, बुद्ध सभी,
स्वरूप निराले तुम्हारे,
जन-जन में वास किया,
सभी बिगडों का उद्धार किया ।

जिसने तुझे स्वीकारा,
तेरे निर्गुण स्वरूप को माना ।
गदगद हुआ अपने जीवन से,
प्रख्यात हुआ जनजीवन में ।।

इतनी तु मुझे शक्ति दे,
बुराइयों से लड़ सकूँ ।
लोभ, मोह, व्यभिचार से परे होकर,
नित्य तेरी वंदना कर सकूँ ।।

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