नई पोथी पढ़, मगरूर बड़े, मॉर्डन बड़े
पुरातन-सनातन के नाम पर देखो चिढ़ जाते
सभ्यता- संस्कृति छोड़ , झूठ के चकाचौंध पर हर्षाते
हों आँख के अंधे और नाम नयनसुख कहलाते ।
वाह रे ! पाखंडियों गजब का विधान रचा है,
हिंदुस्तान की कब्र पे विदेशी ताजमहल सजा रखा है ।
प्यार और रिश्तों के लिए अब तारीख मुक़र्रर कर
माँ बाप के लिए भी एक दिवस बना रखा है ।
तुम आर्यपुत्र, विदेशी मायावी बाहों में कैसे झूल गए
सनातन की शिक्षा, संस्कृति, संस्कार को कैसे भूल गए
वो हरिश्चन्द्र का था कर्म ,वचन, सत्य अटल,
और राजा के परिवार की बिखरी कहानी थी
शान्तनु मत्स्यगंधा के प्रेम में थे आसक्त
और भीष्म को ब्रम्हचर्य की प्रतिज्ञा उठानी थी
मंथरा-कैकयी का कपट, दशरथ वचन से बंधे थे,
वनवासी हो गए राम, होनी की ये कैसी मंजूरी थी
धृतराष्ट्र जन्म से अंधेे, पर गांधारी की क्या मजबूरी थी
भला क्या तपस्वीश्रवण को बहंगी खींचनी जरूरी थी ?
माँ बाप को तीनों लोक मान, लंबोदर ने नापी वो दूरी थी ।
ऐसी कथा पुराणों ने ही तो नींव धरम संभाल रखा है ।
जिस पश्चमीकरण के तुम अंध पिट्ठू बने हो
अर्थ और काम में जो तुम आकंठ सने हो ।
उपभोगवाद से त्रस्त वो, तेरी संस्कृति को हर्ष अपनाते
सत्य की कसौटी पर खरे, वेद पुराणों का सारतथ्य हैं पहचानते ।
आइंस्टाइन को सापेक्षता का सिद्धांत दिया
न्यूटन को गुरुतुवाकर्षण का ज्ञान दिया ।
गीता का भेद समझ परमाणु बम रच डाला जिसने
ग्रह-नक्षत्रों और ब्रह्मांड के रहस्य सुलझा डाला जिसने
अरे ये तो आधार दे रहीं आज के विज्ञानों को
गैरों के बहकावे में, त्यागा था तुमने जिन वेद पुराणों को ।
सावधान हो जाओ ऐसे नक्कालों से
जिगर के टुकडे, रग़ों में पले दूध के संपोलों से
इस खास एक मौके पर तुम आओ तो प्यार जताएंगे,
साल के बाकी दिन फिर कश्मकश में, आंख कैसे मिलाएंगे ।
शुक्र है गरीबी ने अभी वो ईमान धरम बचा रखा है
अमीरी ने तो अपनी जड़ों को वृद्धाश्रम पहुँचा रखा है ।
आज अक्सर जड़े कट जाती हैं,
जब कोंपलें पूर्ण सबल खिल जाती हैं ।
जिस डाली के तुम फूल बन, रूप-खुशबू पर इतराते हो
वर्षों सींचा होगा जब जड़ों ने,
धूप बरसात भी सहा होगा तनों ने,
सर्वस्व न्यौछारा किया होगा तेरे खातिर,
तब जाकर इसकी छावं घनी तुम पाते हो ।
और बैठ तले इसके, क्षद्म सिद्धान्त के राग गाते हो ।
दूर अपने पिण्ड से , भूलके रिश्ते नाते, बंद आशियाने में
कहते हैं अकेले हैं बहुत, बहुत परेशान हैं ।
बहुत से रिश्तों से तो अनजान हैं
पर कई को तो मजबूरी का पल बना रखा है ।
ताऊ फुआ मामा वाले रिश्ते अब चंद निशान हैं,
कमाई की चादर ने परिवार जो एकल बना रखा है ।
तेरी मोह-माया और दुनियादारी की कपट होशियारी ने
इस अर्थ ने ही तो सारा अनर्थ बना रखा है ।
गनीमत है की अभी एक दिन का सब्र बचा है ।
कहीं ना कहीं इंसान तुम्हारे अंदर का जीवित बचा है ।
काश वो दिन न दिखाए, जब ये सब्र क्षण भर का हो ,
वो क्षण किसी झोली में न आये, जब रिश्ते भ्रम का हो
दिखावटी प्यार नहीं, मुश्किल घड़ी में हाँथ छूट न जाये
और छोटी - छोटी बातों पर रिश्तों की डोर टूट न जाये ।
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