दूल्हे की कविता

हैलो ! ...हाँ... हम दूल्हा बोल रहे हैं ।
तीस धूप-छाँव और लू के थपेड़े सहकर
येन-प्रकारेण नौकरी पाकर, पूर्णतः निर्मित
सर्वगुण संपन्न, टिकाऊ, बहुउपयोगी, वारंटी युक्त ।
रिमोट चालित मन बहलाने का खिलौना हो जैसे
शो-पीस सा शादी के बाज़ार में सज रहे हैं ।

चलिए आज आपको अपना अर्थशास्त्र समझाते हैं
हालिया बाजार भाव से थोड़ा अवगत कराते है ।
सरकारी नौकरी वाले उच्च पद वाले या निम्न पद वाले
कोई से मॉडल हों, हांथों-हाँथ हैं बिक जाते ।

डॉक्टर-इंजीनियर, या एमएनसी(MNC) का हो तो
प्राइवेट वाला भी माल कोई बुरा नही ।
बस एक्सपायरी डेट बेरोजगार बीच भँवर मंडराते,
सेल में थोड़े बहुत नए, तो थोड़े पुराने पीस हैं बिक जाते ।

कुछ सस्ते बढियाँ सेकण्ड हैण्ड मॉडल भी हैं, दिखाऊं क्या ?
आपको किस रेंज में चाहिए, जरा अपना भी च्वाइस तो बताइये
दहेज के डिमाण्ड की एक लंबी चौड़ी फेहरिस्त है जनाब
हम नाना प्रकार के हर बजट, हर औकात में हैं पाए जाते।

वैसे, तनख्वाह में तो पाँच जीरो होने ही चाहीए
एस्नो - पाउडर / सिंगार-पटार से ठीक ठाक दिख जाता हो
बीड़ी-सिगरेट, पान-गुटका, दारू ना मुंह लगाता हो ।
बाप दादा की कितनी भी हो जमीन, क्या करेंगे जनाब
बिटिया को थोड़े ही खेतो में हल चलाने जाना है
शहर में अपना घर हो, गाड़ी हो, एसी का ज़माना है।

देखिये कोई डिफेक्टिव पीस न हमे थमाइये,
खाता-पीता ठीक ठाक परिवार हो तो बताइये ।
माना, अब संभव नहीं, हींग लगे ना फिटकिरी रंग चोखा होय,
लेकिन दाम भी लगे, ना कोर्ट कचहरी और धोखा होय ।
दरकिनार पूराने वसूल, बाज़ारवादी उपभोगवादी संस्कृति में
अब कहाँ कोई दशरथ, कोई जनक से आदर्श बचे प्रकृति में ।

वैसे तो, पापा की परी, पापा की शान, अभिमान हैं बेटियां
आज किस मायने में कम, किस हुनर से अनजान हैं बेटियां ।
हम लड़को का क्या था, छड़ियों से पले थे, निठल्ले बड़े थे
कूटे गए थे दमभर, तब जाकर किसी मन-मंदिर के शिवलिंग पड़े थे ।
पत्थर से हम पारस बने,आज सारे कसर, सारे अधूरे सपने पूरे होने है
लाखों में बोली लगी है, सोने में तौलने खरीदार आतुर खड़े हैं ।

अये दुनियावालों ! दोष मेरा अकेले का ही है क्या ?
पुराने रीत के नाम पर, देखो होता है क्या- क्या ?
खरीदारों ने तो बस सदियों से बोली लगाई है
दहेज के लोभियों ने जाने कितनी बेटी जलाई है ।
बाजार में बिकते वस्तुओं की फिर कहाँ जुबान होती है?
शहनाईयों की गूंज में, नेपथ्य में बस विरोध सिसकती है।

काश ! कोख से ससुराल तक अब ना मरे कोई बेटी
गिरवी बाप की अस्थियों पर, कैसे सिकती तेरे चूल्हे की रोटी ।
बेशक अमीरों के रहे हों चोंचले, चुभता नासूर सा फैशन है
बंद हो दहेज का चलन, हुक्मरान ने भी ठाना जतन है
लोगों ने अब क्षद्म सिद्धान्त और समाज ने रूप नया गढ़ लिया है
वैसे भी नए ज़माने में, सर्विस वाली बहू का चलन है ।

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