वो आयी थी पगली मेरी, किसी बहाने से
पास होकर इतने, उस हंसीन नज़राने से
जाने क्यों मायूसियों की मूरत बदल गई ।
एक डर सा खामोश लबों पे, दिल आज़माने से
कोशिश तमाम थी, पा लेने की जिसे जमाने से
हमारी सारी तैयारियों की सूरत बदल गई।
मशगूल थे खुद में, जाने कौन सा ऐब छुपाने में
पढ़ लेती, माथे की शिकन, जख्मों के दर्द औ निशां
बस आंखों से आंखों की मुलाकात अधूरी रह गई ।
खिल उठती चांद चमक चाँदनी, ओस की बूंदों में
मिट जाती सर्द, छँट जाती काली स्याह परत भी
बस अहसास, ख़्यालात और सारी जज्बात अधूरी रह गई ।
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